केदारनाथ मंदिर का इतिहास: जानिए क्या है इस पवित्र स्थल का असली सत्य!

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केदारनाथ मंदिर का इतिहास: केदारनाथ का मंदिर भारत के बारह ज्योतिर्लिंग मंदिरों में से एक है. यह मंदिर हिमालय की गोदी में उत्तराखंड राज्य के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है.

इतिहास में केदारनाथ मंदिर का नाम केदारखंड बताया गया है. यह एक विश्व प्रसिद्ध हिंदू मंदिर है और दुनिया भर से लाखों श्रद्धालु बाबा केदारनाथ के दर्शन के लिए केदारनाथ आते हैं. यह स्थान हिंदुओं के लिए एक पवित्र स्थान माना जाता है और इस स्थान से उनकी आस्था जुड़ी हुई है.

यह मंदिर केवल अप्रैल से नवंबर तक ही भक्तों के लिए खुला रहता है क्योंकि जलवायु परिवर्तन के कारण इसे दिसंबर से मार्च तक भक्तों को दर्शन के लिए बंद रखा जाता है. इस मंदिर ने कई प्राकृतिक आपदाएं देखी हैं लेकिन इसके बावजूद भी यह मंदिर दटके खड़ा है.

आज इस लेख में हम विश्व प्रसिद्ध केदारनाथ मंदिर का इतिहास के बारे में जानने जा रहे हैं. तो इसे जरूर से पूरा पढे ताकि आप को केदारनाथ मंदिर के बारे मे संक्षिप्त मे जानकारी प्राप्त हो सके.

केदारनाथ मंदिर का इतिहास (Kedarnath Temple History)

वैसे तो केदारनाथ मंदिर का इतिहास बोहोत ही प्राचीन है और इसके बारे में कई प्राचीन कथाएं भी प्रचलित हैं. पौराणिक कथाओं के अनुसार इस मंदिर के इतिहास संदर्भ महाभारत मे मिलता है.

पांडवों की पाप क्षमा के लिए यात्रा

कौरव-पांडव युद्ध समाप्त होने के बाद, पांडव विजयी हुए और उन्हें हस्तिनापुर का राज्य मिला, लेकिन उन्होंने इस पाप का प्रायश्चित करने का फैसला किया क्योंकि इस युद्ध में भारी जानमाल की हानि के कारण अपने ही लोगों की हत्या का दोष पांडवों पर लगा था.

भगवान कृष्ण ने पांडवों को सलाह दी कि यदि तुम भगवान शंकर की शरण में जाओगे तो तुम्हें इस पाप से मुक्ति मिल सकती है यह कहके वे वहां से द्वारका के लिए प्रस्थान कर गए.

पांडवों की भगवान शिव से मुलाकात

पांचों पांडव श्री कृष्ण से मिली सलाह के बाद भगवान शंकर की खोज के लिए वाराणसी के लिए निकले गए, लेकिन जब उन्हें भगवान शंकर वाराणसी में नहीं मिले तो वे हिमालय की और प्रस्थान करने लगे. हिमालय पोहोचते ही वे हिमालय एक पर्वत पर खड़े होकर भगवान शंकर की खोज करने मे जुट गए.

तब पांडवों में से एक गदाधारी भीम ने हिमालय के चोटी से चरागाह में चरते हुए एक नंदी बैल को देखा. उन्होंने बैल को भगवान शंकर के रूप में पहचान लिया था और फिर भीम उस बैल को पकड़ने के लिए जल्दी से उसके पास पहुंच गए.

लेकिन तब वह बैल जमीन में दब गया. पर जमीन में गाड़ते समय उसका कूबड़ और पूंछ बाहर रह गई. तब भीम ने बड़ी ताकत से कूबड़ को पकड़ लिया और पकड़ते ही कुछ समय बाद भगवान शंकर अपने असली रूप में प्रकट हुए और पांडवों को मोक्ष का मार्ग दिखाया.

केदारनाथ मंदिर की स्थापना

काहा जाता है भगवान शंकर का आशीर्वाद प्राप्त होने के बाद पांडवों ने उसी जगह पर एक मंदिर की स्थापना की और फिर यही मंदिर केदारनाथ मंदिर के रूप से जाने जाना लगा.

ऐसा कहा जाता है कि भीम और महादेव (बैल) अवतार में एक लड़ाई हुवी, उस लढाई मे महादेव के शरीर के पांच हिस्से अलग-अलग स्थानों पर उड़ गए थे और उस हर एक स्थान पर भगवान शंकर का आसन बन गया उसमे से केदारनाथ मुख्य पीठ है.

पंच केदार के नाम

केदारनाथ
मध्यमेश्वर
तुंगनाथ
रुद्रनाथ
कल्पेश्वर

अगर आप कभी केदारनाथ मंदिर जाएंगे तो देखेंगे कि मंदिर में मौजूद लिंग कूबड़ के आकार का है. वैज्ञानिकों द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक यह मंदिर 8वीं सदी का बताया जाता है. लेकिन कुछ साक्ष्यों के अनुसार यह मंदिर 1200 वर्ष पुराना बताया जाता है, “ग्वालियर राजा भोज स्तुति” में मिले संदर्भ के अनुसार इस मंदिर का निर्माण 1076-99 ईसवी पूर्व के काल में होने के प्रमाण मिलते हैं, जबकि कुछ संदर्भों में यह मंदिर 12 वीं या 13 वीं शताब्दी मे बना होगा ऐसा बताया जाता है.

मंदिर की संरचना

यह मंदिर केदारनाथ, खाचराकुंड और भरतकुंड ये तीन पर्वतों के बीच स्थित है और यह मंदिर 6 फीट के आसन पर बैठा हुआ प्रतीत होता है.

मंदिर की निर्माण शैली

इस मंदिर को बनाने में भूरे रंग के पत्थर का उपयोग किया गया है. इन सभी पत्थरों को एक साथ जोड़कर इस मंदिर का निर्माण किया गया है.

एक बड़े पत्थर के उपयोग से इस मंदिर की छत निर्माण की गई है. इस मंदिर की लंबाई लगभग 187 फीट और चौड़ाई और ऊंचाई 85 फीट है और मंदिर की दीवारें 12 फीट मोटे मजबूत भूरे रंग के पत्थर से बनाई गई है.

मंदिर की विशेषताएं

मुख्य गर्भगृह में स्तिथ शिवलिंग त्रिकोणीय आकार का है. मंदिर के प्रवेश द्वार पर नंदी महाराज हैं और मंदिर के पीछे भीमशिला नाम का एक बड़ा पत्थर है. कहा जाता है की यह पत्थर किसी भी आपदासे इस मंदिर की रक्षा करता है. मंदिर की बाहरी दीवार पर कई देवी देवताओकी छोटी-छोटी मूर्तियाँ बनी हुई हैं. इन मूर्तियोक के कारण मंदिर की सुंदरता दोगुनी हो जाती है.

मंदिर परिसर में महादेव का त्रिशूल स्थापित है. साथ ही मंदिर के बाहर एक बड़ा घंटा बनाया गया है और केदार बाबा की आरती के समय उस घंटा की गूंज सभी दिशाओं में गूँजती है. मंदिर की ओर जाने वाली सीढ़ियों पर ब्राह्मी लिपि में कुछ लिखा हुआ है और उसपे अनुसंधान चल रहा है.

ऐसा कहा जाता है कि कई प्राकृतिक आपदाओं के बाद भी यह मंदिर वैसे के वैसे उस स्थान पर टीका हुआ है. जैसा कि आप जानते होंगे 2013 में उत्तराखंड में आई विनाशकारी आपदा के बाद भी इस मंदिर पर कोई भी आंच नहीं आयी थी.

सारांश

इस लेख में हमने केदारनाथ मंदिर का इतिहास जाना, जो हिंदू धर्म में एक प्रमुख तीर्थस्थान माना जाता है. हमने मंदिर की वास्तुकला, केदारनाथ मंदिर कहां स्थित है, और इसके साथ जुड़ी विभिन्न कथाओं के बारेमे संक्षिप्त मे बताने का प्रयास किया है.

हमें इस लेख पर आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा है, और यदि आपके पास केदारनाथ मंदिर के बारे में अतिरिक्त जानकारी है, तो कृपया हमें ईमेल के द्वारा बताए. हम आपसे उपलब्ध हुई जानकारी की पुष्टि करके इसे इस लेख में जोड़नेका प्रयास करेंगे.

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FAQ’s

  • पांडव केदारनाथ क्यों गए थे?

    पांडवों ने केदारनाथ जाने का कारण यह था कि उन्हें अपने द्वारा किए गए पापों का प्रायश्चित करने का एक मार्ग चाहिए था. महाभारत युद्ध के बाद, जिसमें अनेक अधर्मिक हत्याओं का बोझ पांडवों के सिर पे था, उन्हें इस पाप से मुक्त होने उपाय चाहिए था. उन्हें भगवान कृष्ण से सलाह दी गई कि वे भगवान शंकर की शरण में जाएं, क्योंकि भगवान की कृपा से ही उन्हें इस पाप से मुक्ति मिल सकती थी. इसलिए, पांडव ने अपने आत्मसमर्पण और श्रद्धा के साथ केदारनाथ धाम की ओर प्रस्थान किया.

  • केदारनाथ किसका अवतार है?

    केदारनाथ भगवान शिव का अवतार माना जाता है.

  • केदारनाथ के पीछे की कहानी क्या है?

    केदारनाथ के पीछे की कहानी में पांडवों का भगवान शिव से मिलना और उन्हें अपने पापों का प्रायश्चित करने का मार्ग दिखाना शामिल है. महाभारत युद्ध के बाद, पांडवों ने अपने गुनाहों के कारण केदारनाथ की शरण ली. उन्होंने यहां शिव के अनुपम आशीर्वाद प्राप्त किया और अपनी आत्मा को शुद्ध किया.

  • केदारनाथ में क्या खास है?

    केदारनाथ में शिवलिंग की पूजा होती है जो भगवान शिव को समर्पित है. यहां के प्राचीन मंदिर की विशेषता और ऐतिहासिक महत्व भी है. केदारनाथ की प्राकृतिक सौंदर्य और हिमालयी पर्वत की गोदी में स्थिति इसे और भी विशेष बनाती है.

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