सिद्धिविनायक मंदिर का इतिहास: जानिए कैसे बना यह ऐतिहासिक मंदिर!

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सिद्धिविनायक मंदिर: भारतवर्ष में भगवान गणेश जी के हजारों मंदिर स्तिथ हैं. इनमें से भगवान गणेश के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक मुंबई के प्रभादेवी इलाके में स्थित सिद्धिविनायक मंदिर (shree siddhivinayak temple) है.

यहां आने वाले हर भक्त का मानना ​​है कि गणपति बप्पा यहां दर्शन के लिए आने वाले हर भक्त की मनोकामनाये पूरी करते हैं. इसलिए यहा सामान्य लोगों के अलावा बड़े-बड़े बिजनेसमैन और सेलिब्रिटी बप्पा के दर्शन के लिए हाजिरी लगाते रहते हैं.

गणेश चतुर्थी, विनायक चतुर्थी, संकष्टी चतुर्थी, गणेश जयंती, अंगारकी चतुर्थी के दौरान मंदिर में भक्तों की भीड़ लगी रहती है और मंदिर समिति द्वारा भक्तों को विशेष सेवाएं भी प्रदान की जाती हैं.

आज इस लेख में हम सिद्धिविनायक मंदिर (Shree Siddhivinayak Temple) के इतिहास से जुड़ी कई बाते और जानकारी इसके अलावा सिद्धिविनायक मंदिर कैसे पहुंचे, Siddhivinayak Temple Dadar, Siddhivinayak Mandir Mumbai के बारे मे देखने जा रहे हैं. तो इस लेख को पूरा पढे.

सिद्धिविनायक मंदिर का इतिहास

सिद्धिविनायक मंदिर का निर्माण किसने और कब कराया, इसके पीछे का इतिहास शायद ही आप लोग जानते होंंगे. तो इस मंदिर के निर्माण की कहानी यह है की लक्ष्मण विठू पाटिल नामक एक ठेकेदार हुआ करते थे और उनकी पत्नी देउबाई पाटिल इन दोनों को कोई भी संतान नहीं थी.

निरंतर नि:संतानता का दुख वे अच्छे से जानते थे. तो एक दिन उन्होंने यह सोचा कि कोई भी नि:संतान महिला अगर इस मंदिर में आकर अपने दुखों को भगवान के सामने रखे तो उसका नि:संतानताका दुख दूर होना चाहिये, इस भावना से उन्होंने सिद्धिविनायक के मंदिर के निर्माण के लिए भारी धनराशि दी और यह मंदिर 19 नवंबर 1801 को बनकर तैयार हुआ.

अक्कलकोट के महाराज स्वामी समर्थ के शिष्य रामकृष्ण जाम्भेकर महाराज ने गुरु के आदेश का पालन करते हुवे मंदिर में मुख्य मूर्ति के सामने दो मूर्तियाँ बनाईं और कहा जाता है कि उन दो मूर्तियों को वहीं दफनाया गया था.

स्वामी समर्थ द्वारा की गई भविष्यवाणी के अनुसार 21 साल बाद, दफन किए हुवे मूर्ति के स्थान पर एक मंदार वृक्ष का निर्माण हुआ और इस मंदार वृक्ष की शाखाओं से स्वयंभू गणेश का रूप प्रकट हुआ.

सिद्धिविनायक मंदिर के मूर्ति की विशेषता

सिद्धिविनायक मंदिर के मूर्ति की विशेषता

हमने गणेश चतुर्थी पर अपने घर स्थापित की हुई बप्पा की मूर्ति की सूंड बाएं ओर होती है, लेकिन सिद्धिविनायक मूर्ति की सूंड दाए ओर है.

इस मंदिर को भगवान गणेश जी का सिद्धपीठ कहा जाता है और गणेश जी भक्तों की सभी मुरादे पूरी करते हैं इसलिए इन्हे सिद्धिविनायक के नाम से जाना जाता है.

सिद्धिविनायक मंदिर के गर्भ गृह मे स्थापित गणेश जी की मूर्ति का रूप विलोभनीय है. उनकी चार भुजाएं है इनमे ऊपरी दाहिने हाथ में कमल, बाएं हाथ में फरसा, निचले दाहिने हाथ में मोदक और बाएं हाथ में फूलों की माला है.

सिद्धिविनायक मंदिर की आकर्षक रचना

प्रसिद्ध वास्तुकार शरद आठले ने सिद्धिविनायक मंदिर (Siddhivinayak Temple) का डिजाइन तैयार करने के लिए राजस्थान और तमिलनाडु के कई मंदिरों का गहन सर्वेक्षण किया और सभी पहलुओं की जांच करने के बाद, उन्होंने पुरानी स्थापत्य शैली में बने सिद्धिविनायक मंदिर का जीर्णोद्धार शुरू किया.

मंदिर के निर्माण में इस्तेमाल किए गए पत्थर संगमरमर और गुलाबी रंग के ग्रेनाइट के हैं. मंदिर में तीन मुख्य प्रवेश द्वार हैं और मंदिर बहुभुज है.

यह छह मंजिली मंदिर हैं. मुख्य शिखर पर सोने की परत चढ़ी हुई है और शिखर पर भगवा ध्वज लहरा रहा है. केंद्रीय कलश से सटे छोटे-छोटे कलश भी है जो की पंचधातु से निर्मित है.

सिद्धिविनायक मंदिर कैसे पहुंचे?

अगर आप Siddhivinayak Temple Dadar स्टेशन से आ रहे हैं तो स्टेशन पहुंचने के बाद प्रभादेवी मुंबई जाने के लिए BEST बस की सेवाये उपलब्ध है इसके अलावा दादर स्टेशन से Shree Siddhivinayak Temple तक पहुंचने के लिए कैब (Taxi) सेवा भी है.

यदि परदेश से श्रद्धालु Siddhivinayak Mandir Mumbai में दर्शन के लिए आ रहे हैं तो उन्हें छत्रपति शिवाजी महाराज अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर आना होगा. एयरपोर्ट पहुंचने के बाद, वहां से प्रभादेवी तक पहुंचने के लिए बस या कैब (Taxi) की सेवा उपलब्ध है.

सरकारी बस (एसटी) सेवाये भारत के हर कोने में उपलब्ध है. अगर आप सरकारी बस से आ रहे हो तो मुंबई पहुंचने के बाद वहा से प्रभादेवी (मुंबई) के लिए BEST बस सुविधाये प्रदान की गई है ताकि श्रद्धालुओ को यात्रा मे कोई परेशानी ना हो.

सिद्धिविनायक मंदिर जाने का सबसे अच्छा समय

Shree Siddhivinayak Temple मे दर्शन के लिए अक्टूबर से फरवरी तक का सर्दियों का मौसम सबसे अच्छा माना जाता है क्योंकि मानसून के दौरान मुंबई के इलाकों में बाढ़ और ट्रैफिक जाम जैसी समस्याओं का सामना करना पड सकता है.

अगर समय की बात करें तो दोपहर के समय मंदिर में दर्शन की कतार कम होती है इसलिए भक्त भीड़ कम होने के कारण उचित दर्शन कर सकेंगे और मंदिर की सुंदरता को भी महसूस कर पाएंगे.

माघी गणेश जयंती, अंगारकी और संकष्टी चतुर्थी, गणेश चतुर्थी के दौरान मंदिर में बप्पा के दर्शन के लिए भक्तों की भीड़ उमड़ती है. तो आप उचित समय देखकर मंदिर के दर्शन का प्लान कर सकते है.

सारांश

आज इस लेख में हमने विश्व प्रसिद्ध सिद्धिविनायक मंदिर (Shree Siddhivinayak Temple) के बारे में जानकारी देने की कोशिश की है. इस मंदिर का निर्माण और उसके इतिहास के साथ-साथ मंदिर की संरचना, गर्भगृह में गणेश जी की मूर्ति और मंदिर तक जाने के रास्ते और उचित समय के बारे में भी जानकारी दी है.

अगर आपको इस आर्टिकल के बारे में कोई प्रश्न है तो हुमे कमेंट के माध्यम से जरूर बताएं हम उसका जबाब देनेकी पूरी कोशिश करेंगे और अगर यह आर्टिकल आपको पसंद आए तो इसे अपने प्रियजनोके साथ साझा करे ताकि अगर वे इस मंदिर के दर्शन का विचार करते है तो उन्हे वहा पोहोचने मे कठीनाई ना हो.

और यदि आपके पास इस मंदिर के बारे में अधिक जानकारी है, तो आप इसे हमें ईमेल द्वारा भेज सकते हैं, हम जाँच करके इस जानकारी को अपने लेख में जोड़ने का प्रयास करेंगे.

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FAQ’s

  • सिद्धिविनायक मंदिर में ऐसा क्या खास है?

    सिद्धिविनायक मंदिर में गणेश जी की सिद्धि का अनुभव होता है और भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं. यहां की मूर्ति विशेषता और मंदिर की आकर्षक रचना भी खास है.

  • सिद्धिविनायक का अर्थ क्या है?

    सिद्धिविनायक” का अर्थ है “सिद्धि का विजयक” या “सिद्धि के देवता”. इस मंदिर में भगवान गणेश को इस नाम से पूजा जाता है, जिसका अर्थ है कि वे भक्तों को सिद्धि और सफलता में सहायक होते हैं.

  • मुझे सिद्धिविनायक मंदिर कब जाना चाहिए?

    सिद्धिविनायक मंदिर जाने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से फरवरी तक होता है. यह समय ठंडे मौसम का होता है और बारिश की समस्याओं से बचाव होता है. दोपहर के समय आने पर मंदिर में भीड़ कम होती है, जिससे आप ध्यान और शांति में दर्शन कर सकते हैं.

  • सिद्धिविनायक क्यों प्रसिद्ध है?

    सिद्धिविनायक मंदिर प्रसिद्ध है क्योंकि यहाँ भगवान गणेश की अत्यंत शक्तिशाली और साकार मूर्ति है, जिसे “सिद्धि का देवता” के रूप में पूजा जाता है. लोग मानते हैं कि यहाँ भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं और उन्हें सफलता प्राप्त होती है. इसके अलावा, मंदिर की सुंदर रचना और प्राचीन ऐतिहासिक महत्व भी इसे प्रसिद्ध बनाते हैं.

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