खाटू श्याम का इतिहास: अद्भुत रहस्यों से भरी यह कहानी जरूर सुनें!

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खाटू श्याम का इतिहास: भारत में हिंदू देवी-देवताओं के ऐसे कई मंदिर हैं जो विश्व प्रसिद्ध हैं. उन मंदिरों की प्रसिद्धि सुनकर दूर-दूर से भक्त दर्शन करने आते हैं. अधिकांश मंदिरों का इतिहास सर्वविदित है.

आपने टेलीविजन या मोबाइल पर कई बार खाटू श्याम (Khatu Shyam) नाम जरूर पढ़ा या सुना होगा, आखिर ये खाटू श्याम जी (Khatu Shyam Ji) कौन थे? खाटू श्याम मंदिर (Khatu Shyam Ji Mandir) कहां है और यह नाम इतना प्रसिद्ध क्यों है? इसके पीछे का इतिहास क्या है? यह जानने के लिए आपकी उत्सुकता जरूर से जाग उठी होगी.

तो इस लेख में आज हम खाटू श्याम (Khatu Shyam) के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त करने जा रहे हैं. तो इसे पूरा पढे.

खाटू श्याम मंदिर कहां है?

राजस्थान में स्थित खाटू श्याम जी मंदिर (Khatu Shyam Ji Mandir) लाखों भक्तों की आस्था का विषय है. यह मंदिर राजस्थान राज्य के सीकर जिले के खाटूश्याम गांव में स्थित है, जो भारत का सबसे बड़ा राज्य है और ऐतिहासिक वास्तुकला और पर्यटन के लिए प्रसिद्ध भी है.

खाटू श्याम मंदिर (Khatu Shyam Mandir)

यह मंदिर विश्व प्रसिद्ध है और हर साल लाखों भक्त यहां आते हैं. खाटू श्याम (Khatu Shyam Ji) जी विशेष रूप से हिंदुओं के आस्था का स्थल है.

भक्तों की भावना है कि खाटू श्याम जी के चरणों में व्यक्त की गई कोई भी इच्छा पूरी होती ही है. खाटू श्याम जी को उनके भक्त कलयुग के श्री कृष्ण की उपाधि देते हैं. कहा जाता है कि भगवान कृष्ण ने उन्हें वरदान दिया था कि लोग उन्हें श्याम के रूप में पूजेंगे और आज लाखों भक्त इन्हें खाटूश्याम (Khatu Shyam) के नाम से पूजते हैं.

फाल्गुन माह में खाटू श्याम जी (Khatu Shyam Ji) का बहुत प्रसिद्ध मेला लगता है. यह मेला फाल्गुन शुक्ल पक्ष तृतीया से प्रारम्भ होकर द्वादशी को समाप्त होता है. इस मेले का आनंद लेने और खाटू श्याम जी के दर्शन करने के लिए दुनिया भर से लाखों श्रद्धालु राजस्थान मे स्तिथ खाटूश्याम गांव आते हैं. कहा जाता है कि इस मंदिर का संबंध महाभारत से है.

आगे हम खाटू श्याम मंदिर (khatu shyam ji mandir) के रहस्यमयी इतिहास के बारेमे जानकारी लेंगे.

खाटू श्याम का इतिहास (Khatu Shyam Ji History)

खाटू श्याम का इतिहास महाभारत से जुडा है. पौराणिक इतिहास में श्याम जी का नाम बर्बरीक बताया गया है. भीम जो महाभारत में पांच पांडवों में से एक थे, उनके पोते बर्बरीक यह घटोत्कच और मोरवी के पुत्र थे. वे एक निपुण योद्धा थे. युद्ध कला में महारत हासिल करने में उनकी माँ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

तीन बाणों की कहानी

बर्बरीक ने भगवान शंकर की कठोर तपस्या की और फिर भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर बर्बरीक को तीन बाण दिये. इन बाणों की शक्ति इतनी थी कि इसकी सहायता से बर्बरीक तीनों लोकों पर शासन कर सकते थे. इसी बीच कौरवों और पांडवों मे युद्ध का ऐलान हुआ. तब उनकी माँ के कहने पर, बर्बरीक ने घोषणा की जो भी पक्ष यह युद्ध हारेगा वे उनके पक्ष से युद्ध लढेगा.

भगवान कृष्ण को पहले से ही पता था कि युद्ध का परिणाम क्या होने वाला है. श्रीकृष्ण यह भलीभाति जानते थे कि यदि बर्बरीक एक बाण भी चलाएंगे, तो विरोधी पक्ष यह युद्ध जीत जाएगा और अगर उन्होंने तीन बाण चलाए तो पूरी पृथ्वी नष्ट हो सकती थी.

यह जानकर भगवान कृष्ण ने बर्बरीक की परीक्षा लेने का निर्णय लिया. जब श्री कृष्ण बर्बरीक के पास पहुंचे तो बर्बरीक ने उन्हें प्रणाम किया उसके बाद श्री कृष्ण ने उनके तीर पर संदेह करते हुए बर्बरीक से अपने सभी तीर पीपल के पेड़ पर मारने को कहा.

बर्बरीक ने पहला तीर पीपल के पेड़ पर चलाया और उस तीर से सारे पत्तों पर निशान बन गया और तीर वापस आ गया.

बर्बरीक ने दूसरा बाण चलाया जिसने सभी पत्तों को छेद दिया लेकिन बाण वापस न लौटकर आकाश में विचरण करने लगा यह देख के बर्बरीक सहित वहां मौजूद सभी लोग आश्चर्यचकित हो गए. बर्बरीक ने भगवान कृष्ण से अपने पैर के नीचे दबे पत्ते से अपना पैर हटाने की प्रार्थना की और उन्हें आश्चर्य हुआ, जैसे ही उन्होंने अपना पैर पत्ते से हटाया, तीर सही निशाने पर लगकर वह तीर बर्बरीक के पास वापिस आ गया उसके बाद भगवान कृष्ण ने बर्बरीक को आशीर्वाद दिया और वह वहां से चले गए.

शीश दान की कहानी

उसी शाम भगवान कृष्ण बर्बरीक को युद्ध में शामिल होने से रोकने का विचार करने लगे. उसके बाद तुरंत बर्बरीक से मिलने श्री कृष्ण एक गरीब ब्राह्मण का रूप धारण करके पहुंचे और उन्होंने बर्बरीक से भिक्षा की मांग की.

बर्बरीक ने एक पल की भी देरी किये बिना पूछा कि तुम क्या चाहते हो? ब्राह्मण भेष में श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से कहा कि मैं तुम्हारा जीवन चाहता हूँ. बर्बरीक ने भी बिना एक क्षण सोचे कहा कि मैं अपना जीवन आपको अर्पित करता हूँ और उसके बाद बर्बरीक ने उनसे अपने वास्तविक रूप का परिचय देने का अनुरोध किया.

जैसे ही भगवान कृष्ण अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए, बर्बरीक ने झुककर उन्हें प्रणाम किया और आज से मेरी जिंदगी तुम्हारी है लेकिन दुख सिर्फ इस बात का है कि मैं महाभारत का युद्ध नहीं देख पाऊंगा. यह कहते हुए उन्होंने अपना सिर धड़ से अलग कर दिया और भगवान कृष्ण के चरणों में रख दिया.

भगवान श्रीकृष्ण के आशीर्वाद की कहानी

बर्बरीक के सिर धड़ से अलग करते ही उनके इस बलिदान को देखते हुवे भगवान श्रीकृष्ण ने प्रसन्न होकर उन्हे महाभारत का युद्ध देखने का आशीर्वाद दे दिया और कहा कि कलियुग में तुम्हारे नाम के साथ मेरा नाम जोडा जाएगा. लोग तुम्हें “श्याम” नाम से पूजेंगे और तुम्हें दिव्यता प्राप्त होगी. इसके साथ ही, कलियुग में तुम्हारी प्रसिद्धि पूरे विश्व में फैलेगी और आने वाले भक्तों के सभी कष्ट तुम्हें देख कर दूर हो जाएँगे.

और तबसे कलियुग मे उन्हे श्याम नाम से जाना जाने लगा और जो भी भक्त वहा दर्शन करने आते है उनका दुख दर्द खाटू शाम जी दूर करते है.

सारांश

इस लेख में, हमने खाटू श्याम का इतिहास जाना और उन्हें खाटू श्याम (Khatu Shyam) नाम कैसे मिला और खाटू श्याम मंदिर कहां है इस बारे मे जानकारी देने का प्रयास किया है. तो कृपया इस लेख को अपने प्रियजनों के साथ सोशल मीडिया पर साझा करें ताकि उन्हें भी विश्व प्रसिद्ध खाटू श्याम मंदिर (khatu shyam ji mandir) और उन के इतिहास के बारे में पता चल सके.

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FAQ’s

  • खाटू श्याम जी किसका रूप है?

    खाटू श्याम जी श्री कृष्ण भगवान के रूप में पूजे जाते हैं. वे कलयुग के श्री कृष्ण के रूप में भगवान की उपाधि धारण करते हैं. उनके पूजन से भक्तों का मानना है कि उनके चरणों में सम्पूर्ण कार्यों की सिद्धि होती है और उनकी कृपा से सभी कष्ट दूर होते हैं.

  • बर्बरीक को 3 तीर किसने दिए थे?

    बर्बरीक, एक निपुण योद्धा थे, जिन्होंने भगवान शंकर की कठोर तपस्या की और प्रसन्न होकर, भगवान शंकर ने उन्हें तीन अद्भुत तीर दिए, जिनमें अद्भुत शक्तियाँ थीं. इन तीरों की शक्ति से बर्बरीक को तीनों लोकों पर शासन करने की क्षमता मिली थी.

  • खाटू श्याम को क्या वरदान मिला था?

    भगवान श्रीकृष्ण ने खाटू श्याम को वरदान दिया था कि कलयुग में उन्हें “श्याम” के नाम से पूजा जाएगा. इसके साथ ही, उन्हें दिव्यता प्राप्त होगी और उनकी प्रसिद्धि पूरे विश्व में फैलेगी और उनके आशीर्वाद से भक्तों के सभी कष्ट दूर होंगे.

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